2013 नवंबर । वो दीपावली का दिन था लोग हमें पुराने अखबर में लपेट अपने घर लाये थे, उसी शाम हमारी बड़ी आव भगत हुई थी कुछ लोग 21 दीयों कुछ लोग तो 51 दीयों से मेरी पूजा करते नही थक रहे थे , इतना ही नही पूरा एक साल मेरी खूब पूजा की, साल बीता मेरी इस मूर्ति की एहमियत कम होती चली गयी इतना ही नही अगली दीपावली में तो घर से बेदखल कर नई मूर्ति ले आये, चलो लाये तो लाये घर के सामने एक पेड़ के नीचे दाल गए, जो थोड़ी इज़्ज़त करते थे वो मुझे गोमती नदी तक ले गए प्रवाहित तो नही किया ऊपर से ही नदी में दाल दिए साथ ही कुछ पन्नी कुछ पपुरानी तालिकायें (कैलेंडर ) भी दाल आये, क्या यार इस भाग दौड़ भरी ज़िंदगी में सिर्फ लक्ष्मी जी से पैसा और मेरे से उन्नति ही चाहते हो थोड़ी इज़्ज़त भी दे दो.

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