Sunday, 12 April 2015

वेदर व्हाट थे हेल (weather what the hell )

"ओह वाओ व्हाट आ रोमांटिक वेदर" आज १२/४ /२०१५ इस मौसम  की बरसात देख बहुत सारे शहर वासी यही जुमला बोलते हैं, सुबह मौसम कुछ ऐसा था हवाएँ चल रही थी, धुप का नामोनिशान नही था लोग पतंग बाज़ी के घर से बाहर चरखी और मांझा लिए निकल पड़े थे और आसमान में पेंच लड रहे थे, नज़रे उनकी भी ऊपर थी, कपल जो मरीन ड्राइव पर घूम रहे थे नज़रे उनकी भी ऊपर थी साथ ही साथ उन किसानो की भी नज़रे ऊपर थी फरक बस इतना था कि शहर वाले लोगों की नज़रो में ख़ुशी देखी जा सकती थी और किसानो की नज़रो में गम, हम ये जानना ही नहीं चाहते की उनपे क्या बीत रही होगी, उनकी इस हालत से नुकसान हम शहर वासिओं का भी होगा, इससे लगातार महंगाई का स्तर बढ़ता चला जायेगा, कई  किसान ऐसे भी होंगे जो की किसी से कर्ज़ा ले के अपनी फसल को अपने खून पसीने  सींच के अपने अच्छे कल के लिए सोच रहे होंगे पर हुआ क्या बरसात ने सब तबाह कर दिया, क़र्ज़ में डूबे हुए किसानो के पास आत्महत्या के सिवा चारा भी क्या बचता है, ये तो बारिश से हुआ जो हुआ आगे का तो किसी ने सोचा भी नही है, सारा पानी बदल अप्रैल में ही उड़ेल देंगे तो सावन में पानी की छींटे कहा से आएंगी मेंढकों की तररर तररर की आवाज़ और मोर का वो रंगा रंग नाच कैसे देखने को मिलेगा, ये पानी तो गेहूं के लिए अकाल है पर वो सावन का सुखा धान को बुरे तूफान की तरह उदा देगा कौन देगा किसानो का साथ, कौन लड़ेगा महंगाई से तो इसी लिए चालु रखो भलाई की सप्लाई और इस मौसम पे ध्यान दो की ये क्यों बदल रहा है क्यों सब अस्त व्यस्त हो रहा है, मेरे हिसाब से इसका कारण निर्वनीकरण है प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, हम इन सब पे तो ध्यान ही नही दे रहे बस अपनी लाइफस्टाइल को और अच्छा बनाने में लगे हुए है, एक कार में अकेला आदमी सफर कर के अपने आप को रईसो की श्रेडी में शामिल तो कर देता है पर असल में आने वाली अपनी ही पीढ़ी के लिए कठिनाइयाँ बढ़ा रहा है, इस चीज़ को हमें समझ के अपने आस पास के लोगों  समझना है. 

No comments:

Post a Comment