"ओह वाओ व्हाट आ रोमांटिक वेदर" आज १२/४ /२०१५ इस मौसम की बरसात देख बहुत सारे शहर वासी यही जुमला बोलते हैं, सुबह मौसम कुछ ऐसा था हवाएँ चल रही थी, धुप का नामोनिशान नही था लोग पतंग बाज़ी के घर से बाहर चरखी और मांझा लिए निकल पड़े थे और आसमान में पेंच लड रहे थे, नज़रे उनकी भी ऊपर थी, कपल जो मरीन ड्राइव पर घूम रहे थे नज़रे उनकी भी ऊपर थी साथ ही साथ उन किसानो की भी नज़रे ऊपर थी फरक बस इतना था कि शहर वाले लोगों की नज़रो में ख़ुशी देखी जा सकती थी और किसानो की नज़रो में गम, हम ये जानना ही नहीं चाहते की उनपे क्या बीत रही होगी, उनकी इस हालत से नुकसान हम शहर वासिओं का भी होगा, इससे लगातार महंगाई का स्तर बढ़ता चला जायेगा, कई किसान ऐसे भी होंगे जो की किसी से कर्ज़ा ले के अपनी फसल को अपने खून पसीने सींच के अपने अच्छे कल के लिए सोच रहे होंगे पर हुआ क्या बरसात ने सब तबाह कर दिया, क़र्ज़ में डूबे हुए किसानो के पास आत्महत्या के सिवा चारा भी क्या बचता है, ये तो बारिश से हुआ जो हुआ आगे का तो किसी ने सोचा भी नही है, सारा पानी बदल अप्रैल में ही उड़ेल देंगे तो सावन में पानी की छींटे कहा से आएंगी मेंढकों की तररर तररर की आवाज़ और मोर का वो रंगा रंग नाच कैसे देखने को मिलेगा, ये पानी तो गेहूं के लिए अकाल है पर वो सावन का सुखा धान को बुरे तूफान की तरह उदा देगा कौन देगा किसानो का साथ, कौन लड़ेगा महंगाई से तो इसी लिए चालु रखो भलाई की सप्लाई और इस मौसम पे ध्यान दो की ये क्यों बदल रहा है क्यों सब अस्त व्यस्त हो रहा है, मेरे हिसाब से इसका कारण निर्वनीकरण है प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है, हम इन सब पे तो ध्यान ही नही दे रहे बस अपनी लाइफस्टाइल को और अच्छा बनाने में लगे हुए है, एक कार में अकेला आदमी सफर कर के अपने आप को रईसो की श्रेडी में शामिल तो कर देता है पर असल में आने वाली अपनी ही पीढ़ी के लिए कठिनाइयाँ बढ़ा रहा है, इस चीज़ को हमें समझ के अपने आस पास के लोगों समझना है.
Sunday, 12 April 2015
अख़बार की नींव
ये वकया आज सुबह का है, मैं हर रविवार सुबह फोटोवॉक पर निकलता हूँ साथ होते हैं मेरे कुछ फोटोग्राफर फ्रेंड मैंने आज कैमरा से नही मोबाइल के कमरे से फोटो खीचने का फैसला किया, इस दौरान मेरी नज़र वहां पर काम करते बच्चो पे पड़ी, उनमे से कई बहुत छोटे थे नींद के मारे आँख सूजी हुई थी पर मालिक के लिए पेपर की सेटिंग तो करनी ही थी मैंने उस बच्चे से बात की उसकी आवाज़ से उसकी नींद और थकान साफ़ ज़ाहिर हो रही थी, पर इसकी वजह से उसके काम पे कोई फरक नही पड़ रहा था, उसे काम निपटा के जल्दी घर जाना था मैंने उसे करीब 15 मिनट एकटक देखा और सोच रहा था उसके हालत के बारे में नींद जिससे हम समझौता नही करते उससे वो बच्चा लड़ रहा है, आखिर में उसने अपना काम खत्म किआ और उसके मालिक ने उसे करीब २५-३० रुपया दिए और वो घर की ओर चल दिए, उस समय तक मैंने उसकी कई तस्वीर ली उसमे से अपनी सबसे अच्छी तस्वीर आप सबसे साझा करता हुँ . Tuesday, 7 April 2015
Life of Duster!
My early life was happy and carefree. As a tree in a forest, I enjoyed the warm sunshine, the cool breeze and the songs of birds. But happiness never lasts long. A day came when I was cut down and taken to a carpenter's shop. The carpenter was cruel to me. He sawed me into planks. He put cotton into my planks. He made a Duster out of me. All this gave me great pain but I had to bear it silently. They think that wood has no feelings. How wrong they are!
The carpenter sold me to a stationary shop. I was soon picked up by a school. I was placed in a classroom. The teacher was pleased to have me when I was new.
In this class-room I lead a hard life. If the class is noisy, the teacher rubs me on Black board so cruelly, It hurts me a lot but I have to put up with it. Sometimes, when the teacher is out the boys scratch me with blades or etch out their names on me, even some stupid children use to pull my cotton. It is a great torture but I can do nothing. I feel that I am born to suffer and shall continue to suffer till the end of my days.
The carpenter sold me to a stationary shop. I was soon picked up by a school. I was placed in a classroom. The teacher was pleased to have me when I was new.
In this class-room I lead a hard life. If the class is noisy, the teacher rubs me on Black board so cruelly, It hurts me a lot but I have to put up with it. Sometimes, when the teacher is out the boys scratch me with blades or etch out their names on me, even some stupid children use to pull my cotton. It is a great torture but I can do nothing. I feel that I am born to suffer and shall continue to suffer till the end of my days.
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