ये वाकया आज करीबन १ का है , मैं कॉलेज से लौट रहा था ई.टी चौराहे पर रेड लाइट हुई और मैं आदर्श बालक की तरह लाइन देख के उससे पहले ही रुक गया, रेड लाइट खुलने से चंद मिनट पहले एक कार मुझे टक्कर मारती है, मैंने पलट के देखा तो एक महिला ड्राइवर कार चला रही थी मैंने नम्रता बोला मैडम रोड पे मोटर साइकिल से भी लोग चलते हैं, उधर से तैश भरा उत्तर अत है आगे बढ़ा! यूँ तो बत्तमीज़ि मैं भी कर सकता था पर उससे पहले मेरे ज़हन में एक सवाल उठ गया की क्या होता जा रहा है हमारे लखनऊ को, इसे तो दुनिया मीठी बोली के लिए जानती है खैर ये तो पर्सनल हो गया थोड़ा,
पर क्या मेरे लखनऊ की ट्रैफिक व्यवस्था कभी नही सुधर सकती, सरकार ने सारी ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए ट्रैफिक लाइट्स लगवा रखी हैं जिन्हे कोई फॉलो नही करता, ज़ेबरा क्रासिंग बनवा रखी है जिनपे कोई नही चलता, रोड लाइन बनवा राखी है हर गाडी उससे ५ मीटर आगे ही रूकती है, जिसको जहा से मन कर रहा है गाड़ी मोड़ लेता है और हेलमेट का नाम आते ही सर में दर्द, उलझन, बाल गिरना कुछ ऐसी बिमारिओ के नाम गिना दिए जाते है, और फिर अगर कही एक्सीडेंट होता है तो ज़िम्मेदार सरकार को घोषित कर देते हैं की शहीद पथ पे उल्टा चलने वालो पे सरकार कोई रोकथाम नही कर रही मतलब पढ़ा लिखा आदमी ऐसी बात करता है तो बड़ी शर्मिंदगी होती है! मेरी शिकायत आज की पीठी से है वैसे तो हम बहुत स्मार्ट हैं क्युकी हम स्मार्ट फ़ोन उसे करते है, पर जब यातायात व्यवस्था की बात आती है तो हम पुलिस को अपना अंकल बना के दुहाई मांगते है की सर प्लीज छोड़ दीजिये आगे से नही करेंगे, मेरी समझ में नही आता हेलमेट लगाने से कौन सी आफत आती है ये तो हमारी सुरक्षा के लिए होता है खैर ये तो होती ही है पर साथ ही साथ एक वाकिया और सुनाना चाहूंगा करीबन २ महीने पहले ऑपरेशन आल आउट में मैं भी चेकिंग क दौरान रोक गया सरे कागज़ात दिखाए और जाने दिए मुझे तभी मेने गौर किआ की वहां से आती जाती गाडिओं में सिर्फ आदमीओ को निशाना बना के रोका जा रहा है महिलाये बेझिझक निकलती चली जा रही है, मेरा MJMC करना काम आया मैंने तुरंत वहा बैठे दरोगा साहब से सवाल किआ "सर महिलाओ को रोका क्यों नही जा रहा है" जवाब मिलता है बेटा इनका तो सुप्रीम कोर्ट भी कुछ नही कर सकती हम लोग क्या हैं तभी मैंने बोला की इनके लिए तो भारत के संविधान भी कोई मायने नही रखना चाहिए उधर से जवाब आया जा के कंप्लेंट करो फिर, मैं तो इसी में कंफ्यूज हु की आखिर गलती किसकी है आज के युवा की, ओहदे पे बैठे कानून के रखवालो की या फिर हमारी सरकार की यूँ तो किसी पे ऊँगली उठाना आसान है पर अब आप ही बताइये ऐसे होगी तरक्की ऐसे आएंगे अच्छे दिन!
सौरभ यादव
शायद ये बदलाव खुद ही लाना होगा ।
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