जब छोटे थे तो बड़ा होना एक सपना था, सोचते थे दाढ़ी होगी मूछें होगी लम्बा चौड़ा कद होगा लोग हमें भी भईया बोलेंगे, पर अब जब सब कुछ है तो लगता है वो भी क्या बचपन था,
जब घर में रहते तो आज़ादी को तरसते थे, आज आज़ाद हैं फिर भी घर जाने की जल्दी रहती है,
पहले बहार का खाने को बेताब रहते थे, आज माँ के हाथ के दाल रोटी का सुकून ही अलग है,
बचपन के भी क्या दिन थे, जवानी तो बस ड्रीम थी.