Sunday, 31 May 2015

जवानी ड्रीम्स



जब छोटे थे तो बड़ा होना एक सपना था, सोचते थे दाढ़ी होगी मूछें होगी लम्बा चौड़ा कद होगा लोग हमें भी भईया बोलेंगे, पर अब जब सब कुछ है तो लगता है वो भी क्या बचपन था,
जब घर में रहते तो आज़ादी को तरसते थे, आज आज़ाद हैं फिर भी घर जाने की  जल्दी रहती है,
पहले बहार का खाने को बेताब रहते थे, आज माँ के हाथ के दाल रोटी का सुकून ही अलग है,
 बचपन के भी क्या दिन थे, जवानी तो बस ड्रीम थी.

Monday, 18 May 2015

कहाँ चली गयी हैं सारी खुशियाँ !

बचपन का वो संडे बहुत सारी खुशियाँ ले के  आता था, रंगोली के साथ जलेबि और दही की खट्टी मीठी यादे आज भी दिल को छू जाती हैं, उस समय हमारे पास कुछ भी नही हुआ करता था सिवा खुशियो के, 1 रूपए की 4 टॉफी से उतनी ही ख़ुशी मिलती थी जितनी 5 रुपए की डेरी मिल्क दे जाती थी, शाम को क्रिकेट पूरा उधार पे चलता था बल्ला किसी और का बॉल किसी और की स्टंप की जगह ईंट की कतार में भी खुशिया ही छुपी होती थी, पर आज कहाँ चली गयी हैं सारी खुशियाँ, आज टॉफी की याद नही आती चॉकलेट खाने की फुरसत नही है, क्रिकेट का पूरा साज़ो सामान है पर कहाँ चली गयी हैं सारी खुशियाँ।